ज्ञान मुद्रा और चिन मुद्रा

jana mudra chin mudra

ज्ञान मुद्रा और चिन मुद्रा

विवरण 

अंगूठे के अग्रभाग (टिप) को तर्जनी (index finger) के अग्रभाग से स्पर्श करें और शेष तीन उंगलियों को सीधा रखें। हाथों को ढीला छोड़कर जांघों पर रखें। यदि उंगलियों के सिरे आकाश की ओर हों, तो उसे ‘ज्ञान मुद्रा’ कहा जाता है। इसी प्रकार, यदि उंगलियां पृथ्वी की ओर झुकी हों, तो उसे ‘चिन मुद्रा’ कहते हैं। एक अन्य विधि में अंगूठे के सिरे को तर्जनी के पहले जोड़ (joint) पर छुआया जा सकता है। ज्ञान मुद्रा ऊर्जा ग्रहण करने की स्थिति को दर्शाता है, वहीं चिन मुद्रा साझा करने या देने की क्रिया को दर्शाता है।

प्रभाव और प्रतीक

चूंकि अंगूठे का सिरा पिट्यूटरी और पीनियल ग्रंथियों का केंद्र होता है, इसलिए उस स्थान पर दबाव पड़ने से वे सक्रिय रूप से कार्य करती हैं।

यह शारीरिक और मानसिक संतुलन के लिए सहायक है। तीन सीधी उंगलियां प्रकृति के तीन गुणों: सत्व, रजस और तमस का प्रतिनिधित्व करती हैं।

अंगूठे और तर्जनी द्वारा बनाया गया वृत्त उस दिव्य सान्निध्य का प्रतीक है जहाँ जीवात्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है।

लाभ

  • इस मुद्रा के निरंतर अभ्यास से एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ती है।
  • यह अत्यधिक नींद, अनिद्रा और रक्तचाप जैसी समस्याओं के लिए रामबाण है।
  • यह मानसिक उत्तेजना को शांत कर मन को प्रसन्न करता है।
  • गायत्री मंत्र के जाप के साथ इस मुद्रा का पालन करने से दिव्य चेतना जागृत होती है और निःस्वार्थ भाव उत्पन्न होता है।
  • इसके अतिरिक्त, यह बुरी आदतों को नियंत्रित करने में मदद करती है।

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