पृथ्वी मुद्रा

pritvi mudra

पृथ्वी मुद्रा

विवरण 

अपने दोनों हाथों के अंगूठे और अनामिका (ring finger) के पोरों को आपस में स्पर्श करें। बाकी बची तीन उंगलियों को बिना किसी तनाव के सीधा फैलाकर रखें। अपनी सुविधानुसार दिन में तीन बार, प्रत्येक बार कुछ मिनट के लिए इस हस्त मुद्रा का अभ्यास करें।

लाभ और विशेषताएं

  • यह मुद्रा हमारे शरीर में स्थित मूलाधार चक्र को सक्रिय करती है, जिससे शारीरिक और बौद्धिक कमजोरी दूर होती है।
  • यह मनुष्य की घ्राण शक्ति (सूंघने की क्षमता) को तेज करती है।
  • त्वचा, बालों, नाखूनों और हड्डियों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में यह बेहद मददगार है।
  • शरीर में प्राकृतिक रूप से गर्मी बढ़ाकर यह लिवर (यकृत) और पेट के हिस्सों को नई ऊर्जा प्रदान करती है और चेहरे पर चमक (कांति) लाती है।
  • यह एक सार्थक और सफल जीवन के लिए आवश्यक सद्गुणों जैसे दया, करुणा, प्रेम, सहनशीलता और संतोष जैसी सात्विक भावनाओं को हमारे भीतर जाग्रत करती है।

विज्ञान और सिद्धांत: हमारे शरीर की हड्डियां, मांसपेशियां, त्वचा, तंत्रिका तंत्र (नसों का ढांचा) और रोम कूप पृथ्वी तत्व से बने हैं। इसी के पूरक रूप में, शब्द, रूप, रस, गंध और स्पर्श का आनंद लेने वाली हमारी पांचों ज्ञानेंद्रियां भी इसी तत्व के आधार पर कार्य करती हैं। इसलिए, पृथ्वी मुद्रा के नियमित अभ्यास से ज्ञानेंद्रियां संतुलित स्थिति में आ जाती हैं।

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