विनायक मुद्रा

vinayaka mudra

विनायक मुद्रा (गणेश मुद्रा)

विवरण और अभ्यास विधि

अपने बाएं हाथ की हथेली को छाती के सामने बाहर की ओर रखते हुए उंगलियों को अंदर की तरफ मोड़ें। अब दाहिने हाथ को इस प्रकार लाएं कि उसकी हथेली का पिछला हिस्सा बाहर दिखे, और दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में मजबूती से लॉक (फंसा) कर लें।
हाथों को बिल्कुल हृदय के समानांतर रखें। अब सांस छोड़ते हुए, अपनी पकड़ को ढीला किए बिना, दोनों बाजुओं को विपरीत दिशा में पूरी ताकत से बाहर की ओर खींचें। यह क्रिया आपकी छाती के घेरे और ऊपरी बांहों की मांसपेशियों को मजबूत बनाती है। फिर सांस लेते समय इस खिंचाव को ढीला छोड़ दें। इस प्रक्रिया को छह बार दोहराएं।
इसके बाद, आपस में फंसी हुई हथेलियों को वैसे ही छाती की हड्डी (स्टर्नम) पर रखें और अपना पूरा ध्यान वहीं केंद्रित करें। अब हाथों की स्थिति को उलट दें (यानी दाहिनी हथेली बाहर की तरफ रहे)। इसी नियम के अनुसार फिर से छह बार इस व्यायाम को दोहराएं। इसके बाद कुछ समय के लिए शांत होकर विश्राम करें। दिन में एक बार यह अभ्यास करना पर्याप्त है।

वैकल्पिक बदलाव (दूसरा तरीका)

इस व्यायाम को दोहराते समय एक और तरीका अपनाया जा सकता है। बांहों को छाती के सीधे समानांतर रखने के बजाय थोड़ा तिरछा रखें। इसका अर्थ है कि आपकी एक कोहनी ऊपर की ओर तिरछी होगी और दूसरी कोहनी नीचे की ओर झुकी होगी।

लाभ

  • यह मुद्रा हृदय की गतिविधियों और रक्त संचार (Blood circulation) को उत्तेजित व दुरुस्त करती है।
  • यह छाती की मांसपेशियों को मजबूती देती है और श्वास नली के रास्तों को खोलकर श्वसन क्रिया को सुगम बनाती है।
  • छाती के हिस्से में होने वाली जकड़न या भारीपन को दूर करने के लिए यह बहुत प्रभावी है।
  • आध्यात्मिक रूप से, यह हमारे अनाहत चक्र (हृदय चक्र) को जाग्रत करती है, जिससे हमारे भीतर साहस, आत्मविश्वास, सहृदयता और दूसरों के साथ सकारात्मक रूप से जुड़ने वाले सात्विक गुण बढ़ते हैं।

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