अपान मुद्रा

apana mudra

अपान मुद्रा

विवरण 

अपने दोनों हाथों के अंगूठे, मध्यमा (middle finger) और अनामिका (ring finger) के पोरों को आपस में जोड़ें। बची हुई तर्जनी (index finger) और कनिष्ठा (छोटी उंगली) को बिना किसी तनाव के सीधा फैलाकर रखें। अपनी सुविधानुसार दिन में तीन बार, प्रत्येक बार 15 मिनट के लिए या आवश्यकतानुसार कुछ मिनट तक इस हस्त मुद्रा का अभ्यास किया जा सकता है।

शारीरिक लाभ

  • यह मुद्रा मुख्य रूप से शरीर में जमा दूषित, अशुद्ध और हानिकारक टॉक्सिन्स (विषाक्त तत्वों) को बाहर निकालने में मदद करती है।
  • यह मूत्र विसर्जन (यूरिन) से जुड़ी समस्याओं को दूर कर पूरे शरीर को आंतरिक रूप से स्वच्छ करती है।
    यह पाचन क्रिया (Digestion) को दुरुस्त करने के साथ-साथ बवासीर (Piles) की समस्या को ठीक करने में सहायक है।
  • दांतों और मसूड़ों की मजबूती तथा मधुमेह (Diabetes) को नियंत्रित करने के लिए यह अत्यंत लाभकारी है।
  • मानसिक और गर्भवती महिलाओं का स्वास्थ्य:
    इसके नियमित अभ्यास से मन में धैर्य, शांति, आत्मविश्वास और आंतरिक संतुलन बढ़ता है। यह हमारी सुप्त चेतना को जाग्रत करता है।
    गर्भवती महिलाएं यदि अपने आठवें महीने से प्रतिदिन 30 से 45 मिनट तक इसका अभ्यास करें, तो बिना किसी कठिनाई के आसानी से सामान्य प्रसव (Natural delivery) हो जाता है।

आपातकालीन चिकित्सा और सावधानी:

  • दिल का दौरा (Heart attack) पड़ने वाले व्यक्ति के लिए यह मुद्रा आपातकालीन राहत के रूप में उपयोग की जा सकती है। बाएं हाथ में यह मुद्रा बनाकर, दाहिने हाथ के अंगूठे, मध्यमा और अनामिका को यदि रोगी स्वयं या दूसरों की सहायता से दबाकर रखे, तो तत्काल आए संकट को टाला जा सकता है।
  • ध्यान दें: उल्टी (Vomiting) और दस्त (Diarrhea) जैसी स्थितियों में इस अपान मुद्रा का प्रयोग कभी नहीं करना चाहिए।

विशेषता: प्राचीन काल में कई महान ऋषि-मुनि अपनी इष्ट सिद्धियों के लिए इस मुद्रा का प्रयोग करते थे। प्राण और अपान मुद्राओं के बिना कोई भी ध्यान पूर्ण नहीं माना जाता, क्योंकि ये दोनों ही शरीर के स्वास्थ्य को बनाए रखने में अत्यंत समर्थ हैं।

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