वज्र मुद्रा

vajra mudra

वज्र मुद्रा (रक्त संचार दुरुस्त करने की मुद्रा)
विवरण और अभ्यास विधि:
इस मुद्रा का अभ्यास दोनों हाथों से एक साथ किया जाना चाहिए। सबसे पहले, अपने अंगूठे के पोर (tip) को मध्यमा (middle finger) उंगली के नाखून के बगल में सटाकर दबाएं। इसके बाद, अनामिका (ring finger) को मध्यमा के नाखून के दूसरी तरफ दबाएं और कनिष्ठा (छोटी उंगली) को अनामिका के नाखून के बगल में दबाकर रखें। इस दौरान अपनी तर्जनी (index finger) को बिना किसी तनाव के पूरी तरह सीधा और स्वतंत्र रखें। अपनी शारीरिक आवश्यकता के अनुसार दिन में तीन बार, प्रत्येक बार 5 मिनट के लिए इस मुद्रा का नियमित अभ्यास करें।

विज्ञान और शारीरिक लक्षण:
·स्वास्थ्य सिद्धांतों के अनुसार, जब शरीर में ‘पृथ्वी तत्व’ कमजोर हो जाता है, तब निम्न रक्तचाप (Low Blood Pressure) की समस्या उत्पन्न होती है।
·यह पृथ्वी तत्व सीधे तौर पर जठर (पेट), प्लीहा (Spleen), अग्न्याशय (Pancreas) या कमजोर पड़ चुके हृदय की कार्यप्रणाली से गहरा संबंध रखता है।
·इन आंतरिक अंगों में किसी भी प्रकार का दोष या गड़बड़ी आने पर शरीर में रक्त का सुचारू प्रवाह (Circulation) धीमा पड़ जाता है। इसके प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में व्यक्ति में निरुत्साह, कार्यों के प्रति अरुचि और चक्कर आना जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं।

लाभ:
·वज्र मुद्रा के नियमित अभ्यास से शरीर के भीतर रक्त का संचार (Blood circulation) बेहतरीन तरीके से उत्तेजित होकर सामान्य हो जाता है।
·इसके साथ ही, अपनी मध्यमा उंगली की मदद से नाक की जड़ (ऊपरी हिस्सा), माथे के बीच का भाग, सिर के पिछले हिस्से और गर्दन के पीछे के भाग की हल्की मालिश (अंगमर्दन) करने से लो ब्लड प्रेशर के कारण होने वाली सभी परेशानियां शीघ्र ही दूर हो जाती हैं।

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