वरुण मुद्रा

varuna mudra

विवरण: अपने दाहिने हाथ की कनिष्ठा (छोटी उंगली) के पोर को मोड़ें और उसे दाहिने अंगूठे के निचले हिस्से (बुध पर्वत/बेस) से स्पर्श करें। इसके बाद, दाहिने अंगूठे को उस कनिष्ठा उंगली के ऊपर हल्के से दबाकर रखें। इस प्रकार जोड़ी गई कनिष्ठा और अंगूठे को अपने बाएं अंगूठे की सहायता से धीरे से पकड़ें। इसी समय, बाईं हथेली दाहिनी हथेली को नीचे से कोमलता से ढके (समान रूप से घेरे) रहे।
अपनी आवश्यकता के अनुसार आप इस मुद्रा का दिन में तीन बार, कुछ मिनट के लिए अभ्यास कर सकते हैं।

लाभ:
·जब भी नाक, पेट, बड़ी आंत, भोजन नली (अन्नप्रणाली) या शरीर के किसी भी अंग में अत्यधिक बलगम या कफ (Mucus) जमा हो जाए, तो वरुण मुद्रा का अभ्यास अनिवार्य रूप से करना चाहिए।
·यह शरीर के आंतरिक अत्यधिक तनाव, तंत्रिकाओं (नसों) की अत्यधिक थकान, बिना थके लगातार काम करने की आदत, चिंता और भय जैसी मानसिक परेशानियों को शांत करती है।
·वरुण मुद्रा का नियमित अभ्यास रक्त को शुद्ध करता है और चेहरे की झुर्रियों को दूर करता है। यह पूरे शरीर को प्राकृतिक चमक (कांति) प्रदान करता है।
·मांसपेशियों की जकड़न या ऐंठन के कारण होने वाले गंभीर दर्द को ठीक करने में यह बहुत मददगार है।

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